डॉ दीप्ति सिंह हाडा
भाजपा नगर उपाध्यक्ष, इंदौर
54 वोटों से गिरी उम्मीद, लेकिन रुकेगा नहीं महिला सशक्तिकरण का संकल्प
भारतीय लोकतंत्र के लिए यह क्षण पीड़ादायक भी है और चिंतन का विषय भी, जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम संसद में 54 वोटों से पारित नहीं हो सका। यह केवल एक विधेयक का रुकना नहीं, बल्कि देश की माताओं, बहनों और बेटियों की राजनीतिक भागीदारी की आकांक्षाओं को ठेस पहुंचाने जैसा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस विधेयक को महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा था, उसे विपक्ष के विरोध और राजनीतिक हठधर्मिता के कारण समर्थन नहीं मिल सका। जो दल वर्षों से महिला अधिकारों की बात करते रहे, उन्होंने ही इस अवसर पर अपना वास्तविक चेहरा उजागर कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी की प्रतिबद्धता पर प्रश्न नहीं- प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों को लेकर जो काम हुआ, वह अभूतपूर्व है। उज्ज्वला योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मातृत्व लाभ, महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक शक्ति ये सब उसी सोच का परिणाम हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी उसी संकल्प की कड़ी था। लेकिन लोकतंत्र में सरकार विधेयक लाती है, उसे पारित कराने के लिए सदन में सहयोग भी अपेक्षित होता है। जब विपक्ष ने इस राष्ट्रीय महत्व के विषय को राजनीतिक विरोध का माध्यम बनाया, तब यह बिल 54 वोटों से गिर गया। यह पराजय सरकार की नहीं, महिला हितों के प्रति विपक्ष की सोच की पराजय है।
महिला आरक्षण का इतिहास भी संघर्षों से भरा- महिला आरक्षण का विचार नया नहीं है। 1996 में पहली बार यह विधेयक लाया गया। 1998, 1999 और 2003 में भी प्रयास हुए। 2010 में राज्यसभा से पारित हुआ, पर आगे अटक गया। लगभग तीन दशकों से महिलाएं इस अधिकार की प्रतीक्षा कर रही हैं। ऐसे में जब मोदी सरकार ने इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के रूप में आगे बढ़ाया, तब देश को उम्मीद थी कि राजनीति से ऊपर उठकर सभी दल इसका समर्थन करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
विपक्ष को जवाब देना होगा- आज देश की महिलाएं पूछ रही हैं जो लोग मंचों से महिला सम्मान की बातें करते हैं, वे संसद में महिला आरक्षण के साथ क्यों नहीं खड़े हुए? 54 वोटों से बिल गिरा है, लेकिन इन 54 वोटों ने बहुत कुछ उजागर कर दिया है। यह स्पष्ट हो गया कि महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर कौन गंभीर है और कौन केवल राजनीतिक नारे गढ़ता है।
संघर्ष जारी रहेगा- भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी का संकल्प अडिग है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक बिल नहीं, सामाजिक परिवर्तन का संकल्प है। यह संघर्ष रुकेगा नहीं। महिलाओं को उनका अधिकार मिलेगा, प्रतिनिधित्व मिलेगा और देश की संसद में आधी आबादी की आवाज और बुलंद होगी। इंदौर की धरती, जिसने सदैव राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई है, वहां की एक महिला जनप्रतिनिधि होने के नाते मैं मानती हूँ कि यह समय निराश होने का नहीं, बल्कि महिलाओं के पक्ष में और मुखर होने का है।
54 वोटों से उम्मीद गिरी है, लेकिन नारी शक्ति का संकल्प नहीं। नारी सम्मान का यह अभियान जारी रहेगा, क्योंकि आधी आबादी अब प्रतीक्षा नहीं, भागीदारी चाहती है।










