रक्त रोग हीमोफिलिया, सिकिल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया से बचना जरूरी ( जागरूकता लेख)
जेनेटिक डिसऑर्डर्स से बचना जरूरी
रक्त रोगों से बचने और बचाने जरूरी है जागरूकता अभियान
युवा थैलेसीमिया माइनर जांच अवश्य करवाएं
हाल ही में भोपाल के कुछ ऐसे बच्चों से मुलाकात हुई जो थैलेसीमिया नामक गंभीर रक्त रोग से ग्रस्त हैं। मुझे बच्चों से चर्चा करके लगा कि जो तकलीफ ये बच्चे उठा रहे हैं उसके लिए वे खुद कसूरवार नहीं बल्कि उनके मां-बाप ही इसके जिम्मेदार हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य में सिकल सेल एनीमिया के रोगियों की बड़ी संख्या है। जनजातीय बहुल क्षेत्रों में ये रोगी ज्यादा होते हैं। यह एक तरह का मानवता के लिए घातक रक्त रोग है जिससे बचा जा सकता है। बस इस दिशा में सदैव जागरूक रहने की आवश्यकता है।
क्या हमारा शिक्षित समाज इस बात पर चिंतन नहीं करता कि हम पढ़े लिखे होने के नाते अपने स्वास्थ्य के साथ ही आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ रखने की चिंता करें। रक्त रोग थैलेसीमिया और अन्य रक्त रोग ऐसे घातक रोग हैं जो माता पिता से बच्चे को मिलती है।थैलेसीमिया भी एक ऐसी ही विकराल बीमारी है। इससे बचने के लिए विवाह के पूर्व प्रत्येक युवा को थैलेसीमिया माइनर टेस्ट अवश्य करवा लेना चाहिए। भारतीय समाज में इसका नियंत्रण अब बहुत आवश्यक हो गया है। इस रोग की विकरालता को और चुनौती को समझ कर इससे जूझने के लिए समर्पित, राष्ट्र सेवी कार्यकर्ताओं की भी आवश्यकता हैं। अनेक रक्त रोग पीढ़ी दर पीढ़ी दबे पांव आते हैं और पांव पसार लेते हैं। शिक्षित और सजग समाज की इन पर नजर होना चाहिए। आर्थिक समृद्धि बेमानी है यदि इंसान जागरूक नहीं। आज चिकित्सा विज्ञान क्षेत्र में प्रगति के बाद भी सभी समुदायों में कई रक्त रोग देखने को मिलते हैं। सिकिल सेल एनीमिया जनजातीय समाज में अधिक है। यह भी वंशानुगत रोग है। इसी तरह हीमोफीलिया रोग से ग्रस्त रोगियों की तकलीफें हम सब देखते हैं। थैलेसीमिया का प्रसार कुछ समुदायों में अधिक है। अब समय आ गया है जब इन रोगों को रोकने के लिए प्रबुद्ध समाज सक्रिय हो।
यह सभी जानते हैं कि किसी भी आधुनिक पैथालॉजी में थैलेसीमिया माइनर की जांच एक हजार या पंद्रह सौ रुपए के आसपास हो जाती है। फिर भी इस दिशा में हमारा समाज उदासीन सा है। विवाह के पहले वर वधू ने यदि थैलेसीमिया माइनर जांच नहीं करवाई है और विवाह हो गया तो भी यह मानिए कि कुछ बिगड़ा नहीं है। अभी भी समय है ,इसकी जांच करवाएं। ब्लड सैंपल ही तो देना है। इससे काफी हद तक ऐसे रोग से उपजी बड़ी परेशानी से हम खुद और लाखों परिवार बच सकते हैं।
जांच में यदि पति पत्नी दोनों थैलेसीमिया माइनर से ग्रस्त पाए जाते हैं तो समझ लीजिए खतरे की घंटी बज चुकी है। पत्नी के गर्भवती होने पर भी जांच करवाई जा सकती है। ऐसे शिशु को जन्म देना जो थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त हो सकता है व्यावहारिक नहीं है।इस तरह के गर्भपात को कानूनी मान्यता भी है।
जन्म लेने वाले बालक या बालिका को थैलेसीमिया मेजर हो अर्थात इस जन्मजात रोग को लेकर आए बच्चे और परिवार को कोई विकल्प नहीं बचता। बच्चे को जीवन भर तकलीफ बर्दाश्त करने को विवश हो जाना पड़ता है।
इस रोग के लिए बच्चे को नियमित रूप से रक्त की जरूरत पड़ती है। यह अवधि मासिक ,पाक्षिक या इससे कम भी हो सकती है।
बोन मेरो प्रत्यारोपण इस मर्ज का स्थाई समाधान माना गया है लेकिन हकीकत में इससे भी प्रायः पूर्ण समाधान नहीं होता प्रत्यारोपण की ,सफलता दर कम होने की वजह से। ये ट्रांसप्लांट काफी महंगा भी होता है। थैलेसीमिया रोगी के भाई बहन से बोन मैरो लेकर यह प्रत्यारोपण किया जा सकता है इसके लिए एच एल ए टाइपिंग का सहारा लिया जाता है। ट्रांसप्लांट के लिए
संतोष जनक मैचिंग होना चाहिए। ऐसा होने पर ही प्रत्यारोपण करना संभव होता है।
हालांकि भारत के कई नगरों में इस प्रत्यारोपण की सुविधा शुरू हो गई है। लेकिन परिवार के बच्चे की जिंदगी बचाने और समस्या के समाधान की चाह में परिवार के सभी आर्थिक संसाधन खत्म हो जाते हैं।इसलिए अवेयरनेस से थैलेसीमिया के प्रकरण रोके जा सकते हैं। यही समझदारी है।
आने वाली पीढ़ी को इस तकलीफ से बचाने हम सभी जागरूक बनें।
थैलेसीमिया जेनेटिक डिसऑर्डर है। जन्म लेने के 6 माह के अंदर या उससे पहले इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। ऐसे बच्चों में खून की कभी और शरीर में रक्त का निर्माण न होने के कारण अक्सर थकान, कमजोरी और अन्य परेशानियां दिखाई देने लगती हैं। ऐसे बच्चों को भोजन में आयरन कंपोनेंट ना देने का परामर्श दिया जाता है।जो बच्चे इस परेशानी से जूझ रहे,उनके साथ खड़े हों। यही मानव धर्म है। एक विशेष तथ्य यह भी है कि थैलेसिमिक बच्चे बुद्धि में सामान्य बच्चों से कम नहीं होते बल्कि तीक्ष्ण बुद्धि के होते हैं , लेकिन उनका जीवन अपेक्षाकृत कम होता है। यह बात सिर्फ रोगी या परिवार की क्षति तक नहीं जुड़ी है, इस रोग से ग्रस्त बच्चे समाज की बौद्धिक संपदा का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद स्वास्थ्य गत दिक्कतों के कारण समाज को भी अपेक्षित योगदान नहीं दे पाते जो इनकी प्रखर बुद्धि के कारण मिल सकता है।
लेकिन जागरूकता अभियान भी लगातार चलाएं,ताकि इन रोगियों की संख्या कम होते हुए शून्य स्थिति में ला सकें।
कुछ देश ऐसा करने में सफल हुए हैं। उनसे भी प्रेरणा लें भारत वासी।
आनुवांशिक रूप से होने वाले इस रोग का हमला सर्वाधिक सिंधी समुदाय पर है। इस नाते सिंधी भाषी शादी के पहले थैलेसीमिया माइनर टेस्ट अनिवार्य रूप से करवाएं। नजदीक के रिश्तों में विवाह संबंध होने से भी इस समस्या को फैलने का मौका मिला है।
पंजाबी,मुस्लिम,पारसी,गुजराती समाज भी इस तकलीफ से कोई कम नहीं जूझ रहा। अन्य रक्त रोगों जैसे हीमोफीलिया सिकिल सेल एनीमिया आदि के प्रति भी हमारा नजरिया गंभीर होना चाहिए सजगता तो हर भारतीय में होना चाहिए।
आशा है,इस विषय के विशेषज्ञ चिकित्सकों से सलाह लेकर आप सभी सही मार्ग पर आगे बढ़ेंगे। मुंबई के स्व थदाराम तोलानी ने देश भर में घूम घूमकर थैलेसीमिया से संबंधित जागरूकता गतिविधियों का संचालन किया । निश्चित ही ऐसे प्रयासों के लिए वे पद्मश्री के पात्र थे। अभी भी अनेक कर्मठ समाजसेवी इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। जागरूकता प्रयासों में भोपाल की कविता इसरानी का नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने भारत के कई नगरों में हिंदी और सिंधी भाषा में थैलेसीमिया जागरूकता पर लिखित नाटक दोषी कौन और रक्त दोष के मंचन सफलतापूर्वक किए हैं। इंदौर की डा रजनी भंडारी जी भी इस क्षेत्र में जन जागरूकता के लिए सुदीर्घ सेवाएं देती रही हैं। वे ,सभी के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। हर नगर,कस्बे में ऐसे समाज सेवी हों जो लोगों को राह दिखाएं तो गंभीर रोग की रोकथाम संभव हो सकेगी।
लेखक: अशोक मनवानी,भोपाल













