डॉ दीप्ति सिंह हाड़ा
भाजपा नगर उपाध्यक्ष, इंदौर,
भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी वास्तविक ताकत उसकी समावेशिता और विविधता में निहित है। लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि लंबे समय तक इस लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित रही है। जबकि देश की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, फिर भी संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व संतुलित नहीं रहा। इसी असंतुलन को दूर करने और महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” एक ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी इस विषय पर स्पष्ट रूप से कहा है कि महिलाओं के लिए विधायी संस्थाओं में आरक्षण समय की मांग है। उनका यह विचार न केवल वर्तमान जरूरत को दर्शाता है, बल्कि एक सशक्त और समावेशी भारत के निर्माण की दिशा भी तय करता है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, संक्षिप्त इतिहास
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” का इतिहास लगभग तीन दशक पुराना है। वर्ष 1996 में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया गया था। उस समय इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देना था। हालांकि, राजनीतिक सहमति के अभाव और विभिन्न मतभेदों के चलते यह विधेयक पारित नहीं हो सका।
इसके बाद वर्ष 2008 में इसे पुनः राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया और 2010 में यह राज्यसभा से पारित भी हो गया, लेकिन लोकसभा में इसे मंजूरी नहीं मिल पाई। इस तरह यह विधेयक वर्षों तक लंबित रहा।
आखिरकार, वर्ष 2023 में इस ऐतिहासिक पहल को नई दिशा मिली। 19 सितंबर 2023 को संसद के विशेष सत्र में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” (संविधान का 106वां संशोधन) लोकसभा में पेश किया गया। 20 सितंबर को लोकसभा और 21 सितंबर को राज्यसभा से यह विधेयक पारित हो गया। इसके बाद 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के साथ ही यह कानून बन गया।
हालांकि, इस कानून को लागू करने के लिए जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक है, जिसके बाद ही यह आरक्षण प्रभावी रूप से लागू होगा।
महिलाओं की राजनीतिक भूमिका में विस्तार
इस अधिनियम के लागू होने से महिलाओं की राजनीतिक भूमिका में अभूतपूर्व विस्तार होगा। अब महिलाएं केवल मतदाता या समर्थक की भूमिका तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि नीति-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। जब अधिक महिलाएं संसद और विधानसभाओं में पहुंचेंगी, तो वे अपने अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर नीतियों को अधिक संवेदनशील और जनहितकारी बनाएंगी। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी।
महिलाओं के लिए नए अवसर
“नारी शक्ति वंदन अधिनियम” महिलाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोलता है। यह अधिनियम उन्हें नेतृत्व की भूमिका में आगे आने का अवसर प्रदान करता है। इससे न केवल वर्तमान पीढ़ी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की महिलाओं को भी प्रेरणा मिलेगी। युवतियों के लिए यह एक संदेश है कि राजनीति केवल पुरुषों का क्षेत्र नहीं है, बल्कि वे भी इसमें समान रूप से भागीदारी निभा सकती हैं। इससे समाज में लैंगिक समानता को भी बढ़ावा मिलेगा।
लोकतंत्र की मजबूती
किसी भी लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें सभी वर्गों की कितनी भागीदारी है। “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो लोकतंत्र को अधिक सहभागी और संतुलित बनाता है। महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से राजनीति में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी। कई अध्ययनों में यह देखा गया है कि जहां महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वहां शासन अधिक प्रभावी और संवेदनशील होता है।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
इस अधिनियम का प्रभाव केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी देखने को मिलेगा। जब महिलाएं नीति-निर्माण में भाग लेंगी, तो वे समाज के कमजोर वर्गों, बच्चों और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देंगी। इसके साथ ही महिलाओं की आर्थिक स्थिति में भी सुधार होगा और वे आत्मनिर्भर बनेंगी। इससे समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा और विकास की गति तेज होगी।
चुनौतियां और आगे की राह
हालांकि यह अधिनियम ऐतिहासिक है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कई चुनौतियां भी हैं। सामाजिक मानसिकता, राजनीतिक अनुभव की कमी और संसाधनों की उपलब्धता जैसी बाधाओं को दूर करना आवश्यक होगा। इसके लिए जरूरी है कि महिलाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और अवसर प्रदान किए जाएं। राजनीतिक दलों को भी महिलाओं को अधिक टिकट देने और उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार करने की दिशा में काम करना होगा।













